भूटान तथा सिक्किम की आड़ लेते हुए भारत को घेरने की अपनी कोशिशें जारी रखे हुए है चीन

गत दिनों चीन ने भारत से धमकी भरे स्वर में कहा कि अगर वह अपने चाल-चलन में परिवर्तन नहीं करता तो उसे 1962 में जो हुआ, उसे याद कर लेना उचित होगा। चीन की यह बयानबाजी हैरान करती है। साफ है कि मद में चूर चीन अपना संतुलन खो इस तरह की बातें कर रहा है। इसके पीछे दरअसल एक वजह है। सिक्किम के जिस इलाके में चीन के साथ तनाव जारी है, वहां भारतीय सेना की सामरिक, भौगोलिक और सैन्य स्थिति काफी मजबूत है। भारत ने चीन की धमकियों का करारा जवाब दिया है। केन्द्रीय रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि 2017 का भारत 1962 का भारत नहीं है और न ही वह किसी देश से डरने वाला है। इधर सेना ने कहा है कि तिब्बत के विवादास्पद इलाके चुंबी से सटे सिक्किम गलियारे में 3,000 सैनिकों की मौजूदगी की बात मनगढ़ंत है। सिक्किम सेक्टर की संवेदनशील जगहों पर भारतीय सेना पहले से ही तैनात है, कोई नया परिवर्तन नहीं हुआ है। चुंबी घाटी का हिस्सा, डोेकलम अत्यंत संवेदनशील इलाका है।
दरअसल पिछले 7 दशक से चीन गलत दलीलों के साथ इस घाटी क्षेत्र को अपना हिस्सा बताता आ रहा है। जबकि यह भूभाग भूटान का इलाका है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को बाकी देश से जोड़ने वाला अहम सिलीगुड़ी गलियारा इस घाटी से नीचे महज 50 किलोमीटर की दूरी पर है। भारत के सामरिक हितों के साथ आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से भी यह इलाका बेहद संवेदनशील है। वस्तुत: यह घाटी तिब्बत, भूटान और भारत की सीमाओं पर स्थित है। भारत और चीन के बीच नाथू-ला दर्रा और जेलन दर्रा यहां खुलते हैं। इस संकरी घाटी में सैन्य गतिविधियां बहुत मुश्किल हैं। इसे ‘चिकेन नेक’ भी कहा जाता है। डोेकलम सिक्किम के नजदीक वह क्षेत्र है जिसे चीन ने डोंगलांग नाम दिया है। इस क्षेत्र को लेकर भूटान और चीन के बीच विवाद है।
देखने की बात यह है कि आखिरकार चीन ने ऐसा बयान क्यों दिया? यह सर्वथा सच है कि भारत-भूटान संबंध अपनी तरह के अनूठे हैं। 1947 से लेकर 2007 तक दोनों देश 50 वर्षीय मैत्री संधि से बंधे हुए थे। 2007 के बाद भी पुरानी व्यवस्था को बनाए रखा गया। भूटान की रक्षा और विदेश नीति में भारतीय मदद शामिल रहती है, जबकि चीन और भूटान के बीच किसी तरह के कूटनीतिक संबंध नहीं हैं। 1996 में चीन ने भूटान के सामने कई बाधाएं डाली थीं। 2012 में भी ऐसी कोशिश की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली।
अब है नई नीति
चीन की बौखलाहट का असल कारण है—भारत-अमेरिका संबंध। जब कभी भी दोनों देशों के बीच नैकट्य प्रकट होता है, चीन आनन-फानन ऐसे बयान देने लगता है जिससे भारत भयभीत हो जाए। यह काम उसने पहली बार नहीं किया है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिमालय फ्रंटियर में बदलाव की नींव अपनी प्रथम विदेश यात्रा के साथ ही रख दी थी, जब उन्होंने भूटान की यात्रा की थी। मोदी सरकार ने महज राष्टÑीय हित को सामने रखा। इसके अंतर्गत भारत ने न केवल हिमालयी देशों में अपनी सुरक्षा को चाकचौबंद किया, बल्कि चीन से आर्थिक संबंधों को भी नई ऊंचाई पर ले जाने की शुरूआत की। चीन में तेंग श्याओ ने 70-80 के दशक में चीन की विदेश नीति को विचार विशेष से मुक्त कर राष्टÑीय हित की तरफ मोड़ दिया था। भूटान और नेपाल में एक नई शुरुआत के साथ अपनी विदेश नीति को भारत सरकार ने नया आयाम देते हुए देश की खोई साख को नए सिरे से दुनिया के सामने रखने की कोशिश की है।
चीन ने पिछले 7 दशक में भारत को डराने, घेरने और तंग करने के लगातार प्रयास किए हैं। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में चीन का दबाव इतना बढ़ गया था कि रक्षा और विदेश मंत्रालय अपनी अलग-अलग ढपली बजाते दिखते थे। मोदी की सोच ने ‘ढाक के तीन पात’ वाली विदेश नीति को बदला और एक नई सामरिक सोच विकसित की। इस सामरिक सोच के अंतर्गत भूटान, नेपाल के रास्ते तिब्बत तक परिवर्तन दिखाई देगा। चीनी चक्रव्यूह की काट पर काम भी शुरू हो चुका है। भारत-अमेरिका मैत्री इस सोच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यही कारण है कि  चीन आपे से बाहर हो रहा है। वह भी समझता है कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है। मोदी की सरकार कांग्रेस की सरकार नहीं है। इस सरकार की विदेश नीति एकदम स्पष्ट है और वह है सर्वप्रथम भारत हित। चीन के राष्टÑपति भारत के प्रधानमंत्री से कई बार मिल चुके हैं।
चीन की चाल क्या?
भारत के संदर्भ में चीन के पूरे सामरिक परिदृश्य में तिब्बत धुरी है। तिब्बत चीन के लिए दंत शृंखला के रूप में काम करता है। यह बात माओ त्सेतुंग ने कही थी। इसी के प्रकाश में पिछले कुछ समय से चीन-भूटान सीमा विवाद को लेकर उभरी चीन की बौखलाहट देखी जानी चाहिए। 1998 की संधि के तहत चीन ने कबूल किया था कि वह इस विवादास्पद क्षेत्र में सड़क निर्माण या किसी भी तरह की दखलंदाजी नहीं करेगा। जून 2017 में चीन ने उस संधि को तोड़ दिया और सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी। भारतीय सैनिक चीन की ऐसी हरकतों पर नजर रखने के लिए सिक्किम के उन क्षेत्रों में तैनात हैं, जहां भूटान-सिक्किम-तिब्बत की सीमाएं मिलती हैं। चीन की बयानबाजियों के बाद भूटान ने चीन को दोषी मानते हुए उससे सड़क निर्माण की कवायद बंद करने को कहा है। चीन का मानना है कि भारत भूटान को बोलने के लिए विवश कर रहा है। उसकी जिद है कि भारत की टुकड़ी जब तक ‘विवादास्पद इलाके’ से वापस नहीं जाती, तब तक सड़क निर्माण की प्रक्रिया जारी रहेगी। हालांकि चीन की सोच में सीमा विवाद को लेकर बुनियादी बदलाव देखा जा सकता है। चीन ने बड़ी ही कुटिलता के साथ सीमा विवाद को अपने सामरिक विस्तार के मोहरे की तरह प्रयोग किया है। चीन जम्मू-कश्मीर को विवादास्पद क्षेत्र कहता है, तो उसका कारण सिर्फ पाकिस्तान को खुश करना नहीं है, बल्कि वह इस क्षेत्र में अपनी पैठ बनाकर भारतीय सुरक्षा को हर तरह से कमजोर करने की कोशिश में भी है। उल्लेखनीय है कि अक्साईचिन प्रदेश में सड़क निर्माण के कारण ही चीन ने 1960-62 के बीच सीमा विवाद को विस्फोटक बनाया था। इसी मार्ग से लोपनोर में में परमाणु अस्त्रों के परीक्षण स्थल तक उसकी पहुंच बनती है। दरअसल यहीं से पाक-कब्जे वाले कश्मीर के रास्ते चीन ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच सकता है। चीन की दृष्टि हिंद महासागर पर भी है। वह बड़े पैमाने पर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में नौसैनिक शक्ति का विस्तार कर रहा है। हिमालय की तराई में बसे हुए देशों के बीच सड़क और रेल संपर्कों का निर्माण चीन की चाल है। चीन के काश्गर और पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को जोड़ने वाले कराकोरम हाइवे की लंबाई 1,300 किमी़ है। इस राजमार्ग को ‘फ्रेंडशिप हाईवे’ का नाम दिया गया है। सितंबर 1962 में चीनी आक्रमण के वक्त वहां भारत की सेना पीछे हट गई थी। पुन: पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पूर्वी सीमा के भीतर तक जा घुसी थी। पश्चिमी सीमा पर चीन ने तकरीबन 13 भारतीय सैनिक ठिकानों पर कब्जा कर लिया था। आज पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर नए सिरे से विवाद को जन्म देकर चीन ने भारत की अखंडता को चुनौती देने की हिमाकत की है। उधर अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताता आ रहा है।

नेहरू की गलती और चीन का दबदबा
ब्रिटिश साम्राज्य की सोच दक्षिण एशिया और हिंद महासागर के संदर्भ में समग्र रूप में थी। समुद्री मुहानों पर यह रेखा लाल सागर से मल्लका स्ट्रेट तक फैली हुई थी। सुरक्षा विशेषज्ञ और लेखक जॉन गार्वर का मानना था कि भारत को विरासत में एक ऐसा सामाजिक ढांचा मिला था जिसे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने आदर्शवाद के मोह में तोड़ दिया। हिमालय भारत की सांस्कृतिक धरोहर है। हिमालय की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियों का विस्तार है। तकरीबन 2500 किमी़ तक का पहाड़ी क्षेत्र पश्चिम से पूर्व तक प्रहरी का काम करता है। दरअसल भारत में तिब्बत में गलती हुई। तिब्बत को चीन का अंग बनते देखना और कुछ न कर पाना एक बहुत बड़े आघात की तरह रहा है।

बदल चुका परिदृश्य
पिछले दो दशक से चीन भूटान के साथ एक पैकेज सौदे के तहत सीमा समझौता करना चाहता है। उसका सीमा विवाद केवल दो देशों से है, भूटान और भारत। चीन भूटान को उत्तरी-मध्य हिस्से का विवादास्पद क्षेत्र (जिसमें जकारलूंग और पसालूंग हैं) देकर उसके बदले डोकलम लेना चाहता है, जो पूर्वी हिस्से में है। वह डोेकलम इसलिए लेना चाहता है कि यह इलाका तिब्बत को भूटान से जोड़ता है। इसकी दूसरी खासियत है इससे 50 किमी़ दूरी पर चुंबी घाटी का होना, जो भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को जोड़ती है। चीन 1996 में और पुन: 2012 तथा 2013 में भूटान के साथ जबरदस्ती सीमा संबंधी  सौदेबाजी पर बात कर रहा था। मोदी सरकार के आने से पहले से ही इस बात की चर्चा थी, लेकिन उस दिशा में भारत की ओर से कोई भी सार्थक और महत्वपूर्ण पहल नहीं की गई थी। उलटे, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जाते-जाते सामरिक संसाधनों की कमी का रोना रो बैठे। मोदी सरकार ने अफसोस जताने की बजाए काम शुरू कर दिया। डोेकलम क्षेत्र में भारत की नजर रहने लगी। सिक्किम से भूटान के बीच सड़कों का जाल बिछाया गया। भूटान में भीतर ही भीतर सार्थक प्रयास चल रहे हैं। मोदी सरकार की सोच और नीति ने चीन की दीवार में दरार पैदा कर दी है। चीन ‘वन रोड वन बेल्ट’ की महत्वाकांक्षी योजना के तहत भारत को हर तरह से घेर लेना चाहता है। लेकिन आज भारत के स्वाभिमानपूर्ण अंदाज और राष्टÑहित को सर्वोपरि रखने वाले राजनीतिक नेतृत्व ने उसकी बेचैनी को बढ़ा दिया है।

 

प्रो़ सतीश कुमार
(लेखक केंद्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा में व्याख्याता हैं)

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